पार्क में गंदगी का अंबार, रोशनी-पानी भी नहीं, जंग खाए झूलों से बच्चे मायूस

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 पार्क में गंदगी का अंबार, रोशनी-पानी भी नहीं, जंग खाए झूलों से बच्चे मायूस पार्क की स्थिति अब बहुत खराब है। यह पार्क उपेक्षा और अव्यवस्था का शिकार हो गया है। बच्चों के खेलने की कोई सुविधा नहीं है और पार्क में सफाई का अभाव है। स्थानीय लोगों ने पार्क के... शहर के गौरव कहे जानेवाले   पार्क की दुर्दशा आज सबके सामने है। यह पार्क आज उपेक्षा, बदहाली और अव्यवस्था का प्रतीक बन गया है। मुख्यमंत्री नगर विकास विभाग की ओर से जिला शहरी विकास अभिकरण द्वारा बेलबनवा मोहल्ला में बने  लाखों रुपया खर्च किया गया था। प्रशासनिक उपेक्षा के कारण महज कहीं सालों  में ही शहरवासियों को शुद्ध हवा, हरियाली और बच्चों के खेलने के लिए विकसित किया गया यह पार्क झाड़ियों, कूड़े और जंग खाए झूलों के कारण उपेक्षित हो गया है। अराधना सम्राट लोगों का कहना है कि थोड़ी सी संवेदना और इच्छाशक्ति से यह पार्क फिर से शहर का गौरव बन सकता है। बच्चों का झूला नहीं है : पार्क के एक कोने में बच्चों का एक झूला भी नहीं है और जंग खाया हुआ है। इसके अलावा बच्चों के लिए मनोरंजन की कोई भी सामग्री मौजूद नहीं। जो बच्चे पार्क में आते भी हैं, उन्हें इधर-उधर भागते या मोबाइल में लगे देखा जा सकता है। पार्क के कोने में पड़ा बच्चों का झूला कब का टूट चुका है। इसपर जंगल-झाड़ उग आए हैं। सुरक्षा व्यवस्था नदारद : पार्क का मुख्य गेट हमेशा खुला रहता है। न तो कोई चौकीदार है और न ही कोई निगरानी की व्यवस्था। रात के समय यहां असामाजिक तत्वों  नशेड़ियों  का जमावड़ा हो जाता है। इससे आसपास के मोहल्लों ,  लोग आने से कतराते हैं। पार्क का मुख्य द्वार दिन-रात खुला रहता है। न तो कोई गार्ड है, न कोई सीसीटीवी कैमरा। महिलाओं व बच्चों के लिए यह पार्क अब सुरक्षित नहीं है। बिजली के तार से खतरे की आशंका : पार्क में कई जगहों पर बिजली के तार बिखरे पड़े हैं, जो बारिश में और भी खतरनाक साबित हो सकते हैं। वहीं, पार्क के किनारे लगा पानी की मोटर कहीं महीनों से खराब पडी है। इसके चारों ओर की कलाकृति भी अब क्षतिग्रस्त हो चुकी है। पार्क में प्रवेश करते ही क्षतिग्रस्त कलाकृति पार्क की दुर्दशा बयां करती नजर आती है। स्वच्छता व सौंदर्यीकरण की जरूरत : पार्क जगह-जगह कूड़े से पटा हुआ है। नियमित सफाई नहीं होती। प्रशासनिक उपेक्षा से यह पार्क धीरे-धीरे जंगल में तब्दील हो गया है। एक तो पौधों की संख्या कम है, दूसरे जो बचे हैं उनकी छंटाई भी वर्षों से नहीं हो पायी है। चापाकल वर्षों से सूखा : पार्क में लगे एकमात्र चापाकल से अब पानी नहीं निकलता। गर्मी के मौसम में यहां आने वाले बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे प्यासे लौट जाते हैं। पीने के पानी का कोई दूसरा विकल्प नहीं है। चापाकल सूख व टूट चुका है। पूरे परिसर में एक भी जगह पानी उपलब्ध नहीं है। टहलने के लिए ट्रैक बने : सुबह-शाम टहलने आनेवाले बुजुर्ग भी अब पार्क से दूरी बना चुके हैं। यहां न तो साफ-सुथरा ट्रैक है, न छांव में बैठने के लिए बेंच। टहलने के लिए ट्रैक होना चाहिए।

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